महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर की पहली औपचारिक मुलाकात

महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर की पहली औपचारिक मुलाकात 14 अगस्त 1931 को मुंबई के मणि भवन में हुई थी। यह मुलाकात द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से ठीक पहले हुई और अपने समय की सबसे तीखी तथा वैचारिक रूप से टकरावपूर्ण बैठकों में से एक मानी जाती है।

इस संवाद के दौरान डॉ. अंबेडकर ने कांग्रेस और गांधी की अछूतों के प्रति नीति को केवल औपचारिकता और दिखावे की राजनीति बताया। वहीं गांधी ने दलितों की पीड़ा को लेकर अपनी संवेदना व्यक्त की, लेकिन अंबेडकर ने उनकी भूमिका और दृष्टिकोण पर गंभीर प्रश्न उठाए। इस मुलाकात ने दोनों नेताओं के बीच मौजूद गहरी वैचारिक खाई को स्पष्ट कर दिया।

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मुलाकात के मुख्य बिंदु

स्थान और समय
14 अगस्त, 1931
मणि भवन, मुंबई

गांधी का पक्ष
गांधी ने कहा कि वे डॉ. अंबेडकर से पहले ही अछूतों की पीड़ा को समझते हैं और उनके उत्थान के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

अंबेडकर का जवाब
डॉ. अंबेडकर ने कांग्रेस और गांधी पर दलितों के नाम पर एकत्रित धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस खादी पहनने जैसी बातों पर ज़ोर देती है, लेकिन छुआछूत के उन्मूलन को प्राथमिकता नहीं देती।

अंबेडकर का दर्द और आक्रोश
अंबेडकर ने गांधी से कहा—

“गांधी जी, हमारा कोई वतन (मातृभूमि) नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा कि दलितों की स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें पानी तक उपलब्ध नहीं होता और समाज में उनकी हैसियत कुत्तों-बिल्लियों से भी कम समझी जाती है।

गांधी की प्रतिक्रिया
गांधी ने अंबेडकर को एक सच्चा और बनावटीपन से दूर व्यक्ति बताया तथा उनकी देशभक्ति की सराहना की, लेकिन डॉ. अंबेडकर गांधी की बातों से संतुष्ट नहीं हुए।

वैचारिक मतभेद
यह मुलाकात गांधी और अंबेडकर के बीच के गहरे वैचारिक अंतर को उजागर करती है।
गांधी दलितों को हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा मानते थे और वर्ण व्यवस्था में सुधार के पक्षधर थे।
अंबेडकर दलितों के लिए अलग राजनीतिक पहचान, अधिकार और सामाजिक व्यवस्था के पूर्ण उन्मूलन की मांग कर रहे थे।

निष्कर्ष
संक्षेप में, यह मुलाकात गांधी और अंबेडकर के संबंधों की शुरुआत थी, जिसने उनके राजनीतिक और सामाजिक मतभेदों को स्पष्ट रूप से सामने रखा। यही वैचारिक टकराव आगे चलकर पूना पैक्ट (1932) जैसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक समझौतों का आधार बना।

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