दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल

UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दीपावली का नाम जोड़ने की प्रक्रिया सामुदायिक-चालित और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाती है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत संगीत नाटक अकादमी ने देशभर के विद्वानों, कलाकारों, लेखकों, प्रैक्टिशनर्स और विशेषज्ञों की विविध समिति गठित की। इसमें हिमालय से लेकर तटीय क्षेत्रों तक, शहरों से लेकर दूरस्थ गाँवों तक के समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की गई, जिनमें डायस्पोरा, आदिवासी समूह, ट्रांसजेंडर समुदाय, कलाकार, किसान और धार्मिक समूह भी शामिल थे। विभिन्न प्रारूपों में प्रस्तुत किए गए अनुभवों और गवाही ने दीपावली की सांस्कृतिक महत्ता, इसकी विविधता, इसकी सामुदायिक सहमति और इसे एक जीवंत परंपरा के रूप में प्रमाणित किया।

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UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दीपावली का शामिल होना उन लाखों लोगों को एक सम्मान है जो इस त्योहार को श्रद्धा और उत्साह से मनाते हैं; उन कारीगरों को सलाम है जो इसकी परंपराओं को जीवित रखते हैं; और उन मूल्यों को आदर है जिन्हें दीपावली सदियों से आगे बढ़ाती आई है। यह दुनिया के सामने यह संदेश रखता है कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर सिर्फ याद नहीं की जाती—उसे जिया जाता है, संजोया जाता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है।

फ्रांस, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में राइट टू डिस्कनेक्ट पहले से लागू है। यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर्मचारी कल्याण के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है।

यह ऐसा विधेयक होता है, जिसे किसी मंत्री के अलावा संसद सदस्य द्वारा पेश किया जाता है। ऐसे विधेयक संसद में आमतौर पर शुक्रवार को चर्चा के लिए लाए जाते हैं। भारत में निजी सदस्य विधेयक बहुत कम पारित हो पाते हैं— स्वतंत्रता के बाद से अभी तक केवल 14 PMB ही दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर पाए हैं। 1970 के बाद से एक भी निजी सदस्य विधेयक पारित नहीं हुआ।

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