अरस्तु (Aristotle)
अरस्तु (Aristotle) प्राचीन यूनान के सबसे महान दार्शनिकों और बहुश्रुत (Polymath) विद्वानों में से एक थे। उन्हें अक्सर पश्चिमी विज्ञान का जनक और "दार्शनिक" (The Philosopher) के रूप में जाना जाता है।

अरस्तु: संक्षिप्त परिचय

• नाम: अरस्तु (Aristotle)

• जन्म: 384 ईसा पूर्व, स्टेगिरा (Stagira), उत्तरी ग्रीस

• मृत्यु: 322 ईसा पूर्व, चालसिस (Chalcis), यूबोआ (Euboea), ग्रीस

• गुरु: प्लेटो (Plato) - वे प्लेटो की अकादमी में 20 वर्षों तक शिष्य रहे।

• शिष्य: सिकंदर महान (Alexander the Great)

• विद्यालय: लाइसियम (Lyceum) (पेरीपेटेटिक स्कूल) के संस्थापक।

• योगदान: उन्होंने तर्कशास्त्र, भौतिकी, जीव विज्ञान, तत्वमीमांसा (Metaphysics), नीतिशास्त्र (Ethics), राजनीति, काव्यशास्त्र और
अर्थशास्त्र सहित ज्ञान के लगभग हर क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
जीवन और करियर

1. प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

• पिता: उनके पिता निकॉमैकस (Nicomachus) मैसेडोनिया के राजा अमींटास III (सिकंदर महान के दादा) के शाही चिकित्सक थे। इस कारण अरस्तु का बचपन राजदरबार में बीता, जिससे उन्हें जीव विज्ञान और चिकित्सा में रुचि मिली।

• प्लेटो की अकादमी (367 ई.पू.): 17 या 18 वर्ष की आयु में, अरस्तु एथेंस गए और प्लेटो की प्रसिद्ध अकादमी में शामिल हो गए। वे प्लेटो के सबसे मेधावी शिष्य माने जाते थे और 20 वर्षों तक वहीं रहे।
• प्लेटो की मृत्यु के बाद: 347 ईसा पूर्व में प्लेटो की मृत्यु के बाद, अरस्तु ने अकादमी छोड़ दी और एशिया माइनर की यात्रा की, जहाँ उन्होंने शादी की और अपना शोध जारी रखा।
2. सिकंदर महान के गुरु

• शाही शिक्षक (343 ई.पू.): मैसेडोनिया के राजा फिलिप द्वितीय के निमंत्रण पर, अरस्तु वापस लौटे और उनके 13 वर्षीय पुत्र सिकंदर को लगभग 6 वर्षों तक पढ़ाया। उन्होंने सिकंदर को दर्शन, राजनीति और साहित्य की शिक्षा दी।
3. लाइसियम की स्थापना

• लाइसियम (335 ई.पू.): सिकंदर के अभियान पर जाने के बाद, अरस्तु एथेंस लौटे और अपना स्वयं का शिक्षण संस्थान लाइसियम (Lyceum) स्थापित किया।

• पेरीपेटेटिक स्कूल: इस विद्यालय को पेरीपेटेटिक स्कूल भी कहा जाता था, क्योंकि अरस्तु अक्सर चलते हुए अपने शिष्यों के साथ चर्चा (Peripatos/चलना) करते थे। यह स्कूल शोध और व्यवस्थित अध्ययन का केंद्र बन गया।
• पुस्तकालय: अरस्तु ने एक विशाल व्यक्तिगत पुस्तकालय स्थापित किया, जो प्राचीन दुनिया के महानतम पुस्तकालयों में से एक था।
4. निर्वासन और मृत्यु

• सिकंदर महान की मृत्यु (323 ईसा पूर्व) के बाद, एथेंस में मैसेडोनिया-विरोधी भावना बढ़ गई। अरस्तु पर भी "अधर्म" का आरोप लगाया गया।

• सुकरात जैसी नियति से बचने के लिए, अरस्तु ने स्वेच्छा से एथेंस छोड़ दिया और चालसिस चले गए, जहाँ उन्होंने कहा कि वह एथेनियाई लोगों को दर्शन के खिलाफ "दूसरी बार पाप" करने का मौका नहीं देंगे।

• अगले ही वर्ष, 322 ईसा पूर्व में उनकी मृत्यु हो गई।

अरस्तु का दर्शन और प्रमुख सिद्धांत

अरस्तु का दर्शन उनके गुरु प्लेटो के प्रत्यय सिद्धांत (Theory of Forms) को अस्वीकार करता है। प्लेटो ने माना कि सच्ची वास्तविकता अमूर्त विचारों या 'रूपों' में निहित है, जबकि अरस्तु ने ज़ोर दिया कि सच्ची वास्तविकता भौतिक दुनिया में निहित है, जिसे हम अवलोकन और अनुभव से जान सकते हैं।

1. तर्कशास्त्र का जनक

• अरस्तु को तर्कशास्त्र (Logic) का संस्थापक माना जाता है। • न्यायवाक्य (Syllogism): यह उनके तर्कशास्त्र का केंद्रीय तत्व है। यह तीन भागों वाला एक तार्किक तर्क है: दो आधार वाक्य (Premises) और एक निष्कर्ष (Conclusion)।

• उदाहरण: सभी मनुष्य नश्वर हैं (आधार 1)। सुकरात मनुष्य है (आधार 2)। अतः, सुकरात नश्वर है (निष्कर्ष)।

• उनके तर्कशास्त्र पर सदियों तक पश्चिमी और इस्लामी दर्शन का प्रभुत्व रहा।

2. तत्वमीमांसा (Metaphysics)
• चार कारण (Four Causes): अरस्तु का मानना था कि किसी भी वस्तु को पूरी तरह से समझने के लिए, उसके चार कारणों को जानना आवश्यक है:

1. भौतिक कारण (Material Cause): वह सामग्री जिससे वस्तु बनी है (जैसे- मूर्ति का पत्थर)।

2. स्वरूप कारण (Formal Cause): वह रूप या सार जो वस्तु को बनाता है (जैसे- मूर्ति का डिज़ाइन)।

3. निमित्त कारण (Efficient Cause): वह चीज़ जिसने वस्तु को बनाया (जैसे- मूर्तिकार)।

4. अंतिम कारण (Final Cause) / प्रयोजन: वस्तु का उद्देश्य या लक्ष्य (जैसे- पूजा या प्रदर्शन के लिए)।

• शक्ति (Potency) और वास्तविकता (Actuality): यह सिद्धांत बताता है कि हर वस्तु में कुछ बनने की शक्ति (संभावना) होती है,
और जब वह उस उद्देश्य को प्राप्त कर लेती है, तो वह वास्तविकता बन जाती है।

3. नीतिशास्त्र (Ethics)

• निकॉमैकियन एथिक्स (Nicomachean Ethics): यह उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण नैतिक कृति है।

• यूडिमोनिया (Eudaimonia): अरस्तु के अनुसार, मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य यूडिमोनिया है, जिसे अक्सर "खुशहाली," "समृद्धि," या "उत्कृष्ट जीवन" के रूप में अनुवादित किया जाता है।

• स्वर्ण मध्य मार्ग (Golden Mean): यूडिमोनिया प्राप्त करने का मार्ग सद्गुण (Virtue) है, जो दो अतिवादी बुराइयों (अभाव और अतिरेक) के बीच का मध्य मार्ग होता है।

• उदाहरण: कायरता (अभाव) और उतावलापन (अतिरेक) के बीच का सद्गुण साहस है।

4. राजनीति (Politics)

• उन्हें राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है।

• "मनुष्य स्वभाव से एक राजनीतिक पशु है" ("Man is by nature a political animal")। उनका मानना था कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से समुदायों (राज्य या पोलिस) में रहते हैं और सबसे अच्छे जीवन के लिए राज्य आवश्यक है।

• राज्य का उद्देश्य: राज्य का उद्देश्य केवल जीवन की रक्षा करना नहीं, बल्कि नागरिकों के लिए एक अच्छा जीवन सुनिश्चित करना है।

• सर्वश्रेष्ठ शासन: उन्होंने तीन तरह के शासन (राजतंत्र, अभिजाततंत्र, पॉलिटी) को सही माना और उनके विकृत रूपों (तानाशाही, गुटतंत्र,
) की आलोचना की। उन्होंने 'पॉलिटी' (संवैधानिक गणराज्य) को सर्वश्रेष्ठ व्यावहारिक शासन माना।

5. जीव विज्ञान (Biology)

• अरस्तु को जीव विज्ञान और जंतु विज्ञान (Zoology) का जनक माना जाता है।

• उन्होंने लगभग 500 विभिन्न प्रजातियों के जानवरों का अवलोकन और वर्गीकरण किया।

• वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जानवरों को एक व्यवस्थित तरीके से वर्गीकृत करने का प्रयास किया।

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